शनिवार, 29 दिसंबर 2007

आज...................

आज रात कुछ थमी थमी सी

स्वप्न न जाने कैसे भटके
नयनो की कोरो से छलके

दूर स्वान की स्वर भेदी से, हर आशाये डरी डरी सी

दर्दों का वह उडनखटोला

लेकर मेरे मन को डोला

स्याह रात की जल धारा से, मेरी गागर भरी भरी सी

शंकावो का कसता धेरा
कैसा होगा मेरा सवेरा


मंजिल के सिरहाने पर ये, राहे कैसी बटी बटी सी

स्वरचित..........................................................................vikram





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