गुरुवार, 27 दिसंबर 2007

ओ महाशून्य...............

ओ महाशून्य ओ महामौन

हे तन विहीन तू कहा लीन
ले मेरे जीवन गीत छीन

स्वर मेरे कर तू अभि-कुंठित,हो मौन बने ये दिग्विहीन

मेरा अकार कर निराकार
जाना मुझको हैं काल-द्वार

जीवन उत्सव उत्सर्ग हेतु, अभिमंत्रित कर तू मौन बीन

तू हर ले मुझसे प्राण-बीज
अंकुरित न कर दे कोई सीच

अब मुझे शून्य में सोने दे,चिर-निन्द्रा में हो के बिलीन

स्वरचित..........................vikram

1 टिप्पणी:

परमजीत सिहँ बाली ने कहा…

उस महाशुन्य के प्रति लिखी समर्पण की ,आपकी रचना ्बहुत अच्छी लगी।