ओ महाशून्य ओ महामौन
हे तन विहीन तू कहा लीन
ले मेरे जीवन गीत छीन
स्वर मेरे कर तू अभि-कुंठित,हो मौन बने ये दिग्विहीन
मेरा अकार कर निराकार
जाना मुझको हैं काल-द्वार
जीवन उत्सव उत्सर्ग हेतु, अभिमंत्रित कर तू मौन बीन
तू हर ले मुझसे प्राण-बीज
अंकुरित न कर दे कोई सीच
अब मुझे शून्य में सोने दे,चिर-निन्द्रा में हो के बिलीन
स्वरचित..........................vikram
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1 टिप्पणी:
उस महाशुन्य के प्रति लिखी समर्पण की ,आपकी रचना ्बहुत अच्छी लगी।
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