सोमवार, 24 दिसंबर 2007

आज रात...............

आज रात कुछ थमी-थमी सी

स्वप्न न जानें कैसे भटके
नयनों की कोरो से छलके

दूर स्वान की स्वर भेदी से ,हर आशाये डरी-डरी सी

दर्दो का वह उडनखटोला
ले कर मेरे मन को डोला


स्याह रात की जल-धरा से ,मेरी गागर भरी-भरी सी

शंकावो का कसता धेरा
कैसा होगा मेरा सवेरा

मंजिल के सिरहाने पर ये ,राहें कैसी बटी-बटी सी

स्वरचित................vikram

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