होती है जब भी शाम सखे
तरु पातों को करके कंचन
सरिता को दे सिन्दूरी तन
जाने से पहले करता है,रवि धरती का ऋँगार सखे
नीडो मे सबको पहुचाता
रवि अस्ताचल को हैं जाता
पश्चिम की गोदी मे छुप कर वह करता हैं ,विश्राँम सखे
मेरी आशा की श्रांत किरण
लौटी हैं दुःख का किये वरण
आकर दृग बिन्दु कपोलों पर, रक्तिम होते हर शाम सखे
vikram
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